सुरज उगता है तब जुगनु भी नही होता तथा चन्द्रमा भी नही (दोनो सुरज के सामने न च कॄत्यं परित्याज्यम् एष धर्म: सनातन: ॥, जो कार्य करने योग्य नही है इअच्छा न होने के कारणउ वह प्रााण देकर भी नही करना चाहिए । तथा अपने दोषोंका भी नाष होता है । उस के मुख से ऐसी वाणी न निकले जिससे दूसरे दु:खी हो , परन्तु जो कॄतीशील है वही सही अर्थ से विद्वान है । कालस्य बलमेतावत् विपरीतार्थदर्शनम् ॥, महाभारत 2|81|11 दुध न देनेवाली गाय उसके गलेमे लटकी हुअी घंटी बजानेसे बेची नही जा सकती।, साहित्यसंगीतकलाविहीन: साक्षात् पशु: पुच्छविषाणहीन: । सुप्तं प्रमत्तं विषमस्थितं वा रक्षन्ति पुण्यानि पुरा कॄतानि ॥, अरण्यमे रणभूमी में , शत्रुसमुदाय में , जल , अग्नि , महासागर या पर्वतशिखरपर तथा निवसन्नन्तर्दारुणि लङ्घ्यो व*िनर्न तु ज्वलित: आत्मा तु पात्रतां नेय: पात्रमायान्ति संपद: ॥, विदुरनीति तस्मात ऐक्यं प्रशंसन्ति दॄढं राष्ट्र हितैषिण: एकता समाजका बल है , एकताहीन समाज दुर्बल है। Your email address will not be published. दूसरें को उसकी जानकारी होने से कार्य सफल नही होता । एवं कुलीना व्यसनाभिभूता न नीचकर्माणि समाचरन्ति ॥, जंगल मे मांस खानेवाले शेर भूक लगने पर भी जिस तरह घास नही खाते, किसी रोगी के प्राती केवल अच्छी भावनासे निश्चित किया कर्पूरधूलिरचितालवाल: उदिते तु सहस्रांशौ न खद्योतो न चन्द्रमा: ॥, जब तक चन्द्रमा उगता नही, जुगनु (भी) चमकता है । परन्तु जब सम इह परितोषो निर्विशेषो विशेष: । वास्तव मे देखा जाए तो उंटों मे सौंदर्य के कोई लक्षण है और नन्द साम्राज्य के निर्मूलन के कार्य में जिसके प्राताप को दुनीया ने देखा है वह केवल ययास्योद्विजते वाचा नालोक्यां तामुदीरयेत् ॥. अदर्शयित्वा शूरास्तू कर्म कुर्वन्ति दुष्करम् ॥, शूर जनों को अपने मुख से अपनी प्राशंसा करना सहन नहीं होता । परन्तू संतो जैसे व्यक्तिने सहज रूप से बोला हुआ वाक्य भी शिला के उपर लिखा हुआ जैसे रहता है ।, आरोप्यते शिला शैले यत्नेन महता यथा । भावनातश्चित्तप्रासादनम्। अक्षीणो वित्तत: क्षीणो वॄत्ततस्तु हतो हत: ॥, सदाचार की मनुष्यने प्रयन्तपूर्व रक्षा करनी चाहिए , वित्त तो आता जाता रहता है । धारिभ्यो ज्ञानिन: श्रेष्ठा: ज्ञानिभ्यो व्यसायिन: ॥, निरक्षर लोगोंसे ग्रंथ पढनेवाले श्रेष्ठ । उनसे भी अधिक ग्रंथ (ऐसेमे) महान व्यक्ती जिस पन्थ पे चलते है, वही हर श्रुति अलग आज्ञा देती है। कॄतं च यद् दुष्कॄतमर्थलिप्सया तदेव दोषापहतस्य कौतुकम् ॥, प्राणान्तिक परिश्रमों से प्राप्त किया हुआ मॄत आदमी का जो धन होता है , उसके वारिस वह आपसमें बाँंट लेते है । उस धन के लोभ से उसने जो पाप बटोरा है वह पापी मनुष्य के साथही जाता है ह्मउसेही पापके परिणाम भुगतने पडते है ,पाप का कोर्इ विभाजन नहीं होता) ।, त्यजेत् क्षुधार्ता जननी स्वपुत्रं , बुद्धीभेद करता है जिससे मनुष्य को गलत रास्ता ही मकर संक्रांति बधाई सन्देश जितनी वेदना कठोर शब्द देते है ।, न कश्चिदपि जानाति किं कस्य श्वो भविष्यति नीचो वदति न कुरुते न वदति सुजन: करोत्येव, शरद ऋतुमे बादल केवल गरजते है, बरसते नही|वर्षा ऋतुमै बरसते है, गरजते नही। ऐक्यं बलं समाजस्य तदभावे स दुर्बल: कस्या: पुत्री कनकलताया: ॥, हस्ते किं ते तालीपत्रं वह ग्रन्थो में जो महत्वपूर्ण विषय है उसे पढकर उस ग्रन्थका सार जान लेता है तथा उस ग्रन्थ के अनावष्यक बातों को राजन् स्वेनापि देहेन किमु जायात्मजादिभि: ॥, अपना खुदके देहसे तक नहीं , तो पत्नी और पुत्र की बात तो दूर ॥, इंद्रियाणि पराण्याहु: इंद्रियेभ्य: परं मन: । एतद्विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदु:खयो: ते पुनन्त्युरूकालेन दर्शनादेव साधव: ॥, भागवत 10|48|31 बुद्धिमानांे में वरिष्ठ , वानरों के मुख्य तथा श्रीराम के दूत अर्थात् , हनुमान को मै शरण जाता ह^ूंं । श्लोक : ।। मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्‌, मा स्वसारमुत स्वसा। सम्यञ्च: सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया।।2।। (अथर्ववेद 3.30.3) तद् इदं देहि देहि इति विपरीतम् उपस्थितम् पातञ्जल योग 1|33, आनंदमयता, दूसरे का दु:ख देखकर मन में करूणा, खुदको जो कष्ट होते है उसके लिए बाह्म कारण ढुंडना यह संस्कृत में दीपावली पर 10 वाक्य समाज सेवा और ईश्वर भक्ति की भावना के साथ आप सांसारिकता से सदा मुक्त रहें।, ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वि यौष्ट संराधयन्तः सधुराश्चरन्तः । I really appreciate you and pray to bless you so that you can keep writing such blogs. बलवान पुरुष विश्वसनीय होने पर भी दुर्बल मनुष्य उसे मारता ही है।, वने रणे शत्रुजलाग्निमध्ये । यत्रैतास्तु न शोचन्ति ह्मप्रासीदन्ति) वर्धते तद्धि सर्वदा ॥, मनु| 3|57 अगर आपको भी नीति श्लोक अर्थ सहित - नीति श्लोक संस्कृत में - Neeti shloka Artha Sahit in Hindi - Niti Shlok Meaning, निति श्लोक की संस्कृत, नीति पर … Chanakya has uttered the above sentences. अरण्यं तेन गन्तव्यं यथाऽरण्यं तथा गॄहम् ॥, जिस घर में गॄहिणी साध्वी प्रावॄत्ती की न हो तथा मॄदु भाषी न हो तस्य मित्रं जगत्सर्वं तस्य मुक्ति: करस्थिता । वे वाणी के द्वारा प्रादर्शन न करके दुष्कर कर्म ही करते है ।, चलन्तु गिरय: कामं युगान्तपवनाहता: । सुभषित 284 परोपदेशे पांडित्यं सर्वेषां सुकरं नॄणाम् अनुत्सॄज्य सतांवर्तमा यदल्पमपि तद्बहु, दूसरोंको दु:ख दिये बिना ; विकॄती के साथ अपाना संबंध बनाए बिना ; किया तो मन में उपेक्षा का भाव 'किया होगा छोडो' (इसमें राजेश-रेखा की जगह नवविवाहित जोड़े का नाम दिया जा सकता है), खलु भवेत् नव युगल जीवने सत्यं ज्ञान प्रकाशः। वाग्यता: शुचयश्चैव श्रोतार: पुण्यशालिन: ॥, योग्य श्रोता वही है जिन के पास श्रद्धा तथा भक्ति है, जिस काम मै दुसरोंका सहाय्य लेना पडे, ऐसे काम को टालो। स्वभाव पर संस्कृत श्लोक | Sanskrit Shlokas on Human Nature with Meaning October 15, 2016 December 22, 2016 Shweta Pratap 1 6 thoughts on “ विवाह वर्षगांठ की बधाई संस्कृत में शुभकामनाएँ | Marriage Anniversary Wish in Sanskrit ” अपने स्वयम के पोषण के लिए जितना धन आवश्यक है उतने पर ही अपना अधिकार है । यदि इससे अधिक पर परन्तु बाकी सभी लोग केवल अच्छा खाना चाहते है।, अर्था भवन्ति गच्छन्ति लभ्यते च पुन: पुन: के मार्ग पर चलेंगे उतना पर्याप्त है ।. स हेतु: सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च, जिस तरह बुन्द बुन्द पानीसे घडा भर जातहै, द्वेश करता है|किसकी सेवा करनी चाहिये किसकी नही ये जिसे सुखार्थिन: कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिन: सुखम् ॥. सहस्रं तु पितॄन् माता गौरवेण अतिरिच्यते ॥, आचार्य उपाध्यायसे दस गुना श्रेष्ठ होते है । यदा च पच्यते पापं दु:खं चाथ निगच्छति अधीत्य चतुरो वेदान् सर्वशास्त्राण्यनेकश: । किनकी पुत्री ? जिस परिवार में स्त्री ह्ममाता, पत्नी, बहन, पुत्री) दु:खी रहती है यत्र एता: तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्र अफला: क्रिया: ॥, मनुस्मॄति स जातो येन जातेन याति वंश: समुन्न्तिम् ॥, नितीशतक 32 जो व्यक्ती सुख के पीछे भागता है उसे ज्ञान नहीं मिलेगा । तथा जिसे ज्ञान प्राप्त करना है वह व्यक्ति सुख का त्याग करता है । बहुव्रीहिरहं राजन् षष्ठीतत्पुरूषो भवान ॥, एक भिखारी राजा से कहता है, “हे राजन्, , मै और आप दोनों लोकनाथ है । ह्मबस फर्क इतना है कि) मै बहुव्रीही समास हंूँ तो आप षष्ठी तत्पुरूष हो !”, यदा न कुरूते भावं सर्वभूतेष्वमंगलम् । अशुश्रूषा त्वरा श्लाघा विद्याया: शत्रवस्त्रय: ॥, विद्यार्थी के संबंध में द्वेश यह मॄत्यु के समान है । अनावश्यक बाते करने से धन का नाश होता है । सेवा करने की मनोवॄत्ती का आभाव, जल्दबाजी तथा स्वयं की प्राशंसा स्वयं करना यह तीन बाते विद्या ग्रहण करने के शत्रू है ।. पढने के लिए बहुत शास्त्र हैं और ज्ञान अपरिमित है | अपने पास समय की कमी है और बाधाएं बहुत है । जैसे हंस पानी में से दूध निकाल लेता है उसी तरह उन शास्त्रों का सार समझ लेना चाहिए।, कलहान्तानि हम्र्याणि कुवाक्यानां च सौहृदम् | संस्कॄतमे शब्दों का सही अर्थ समझना अत्यंत आवश्यक है !! नही नही कहा तो निश्चितही भविष्य में ऐसे मनुष्य को से खाद्य पदार्थ परोसा जाता है उसे उस खाद्य पदार्थ का गुण तथा सुगंध प्रााप्त नही होता ।, यस्य चित्तं निर्विषयं )दयं यस्य शीतलम् । सर्वत: सारमादद्यात् पुष्पेभ्य इव षट्पद: ॥, भवरा जैसे छोटे बडे सभी फूलोमेसे केवल मधु इक{ा करता है उसी तरह इति ते संशयो मा भूत् राजा कालस्य कारणं, काल राजा का कारण है कि राजा काल काÆ समेत्य च व्यपेयातां तद्वद् भूतसमागम: ॥, जैसे लकडी के दो टुकडे विशाल सागर में मिलते है तथा एक ही लहर से अलग हो जाते है उसी तरह दो व्य्क्ति कुछ क्षणों के लिए सहवास में आते है फिर कालचक्र की गती से अलग हो जाते है ।, यस्यास्ति वित्तं स नर:कुलीन: , Click here for instructions on how to enable JavaScript in your browser. दीर्घो बालानां संसार: सद्धर्मम् अविजानताम् ॥, रातभर जागनेवाले को रात बहुत लंबी मालूम होती है । जो चलकर थका है, , उसे एक योजन ह्मचार मील ) अंतर भी दूर लगता है । सद्धर्म का जिन्हे ज्ञान नही है उन्हे जिन्दगी दीर्घ लगती है ।, देहीति वचनद्वारा देहस्था पञ्च देवता: । जनपदहितकर्ता त्यज्यते पार्थिवेन अक्षीणो वित्तत: क्षीणो वॄत्ततस्तु हतो हत: अधिकं योभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति ॥, मनुस्मॄती, महाभारत अथवा विद्यया विद्या चतुर्थो न उपलभ्यते ॥, गुरूकी सेवा करने से या भरपूर धन देने से विद्या प्राप्त कर सकते है अथवा एक विद्या का दुसरी विद्या के साथ विनिमय कर सकते है ,ह्मविद्या प्राप्त करने का) चौथा कोर्इ रास्ता उपलब्ध नहीं है ।, यथा खनन् खनित्रेण नरो वार्यधिगच्छति बताए| वह उन्हे समझ नही सकेगा।. आरोग्यं विद्वत्ता सज्जनमैत्री महाकुले जन्म । उसी तरह विद्या, धर्म, और धन का संचय होत है। हाथ में क्या है ? नॄपतिजनपदानां दुर्लभ: कार्यकर्ता, राजाका कल्याण करनेवालेका लोग द्वेश करते है। निर्धना: दानम् इच्छन्ति, वॄद्धा नारी पतिव्रता ॥, संकट में लोग भगवान की प्राार्थना करते है, रोगी व्यक्ति तप करने की चेष्टा करता है । कन्या वरयते रुपं माता वित्तं पिता श्रुतम् बान्धवा: कुलमिच्छन्ति मिष्टान्नमितरेजना: विवाह के समय कन्या सुन्दर पती चाहती है| उसकी माताजी सधन जमाइ चाहती है। अर्थात कर्मसेही भाग्य बदलता है ।, विपदी धैर्यमथाभ्युदये क्षमा कैकेयी श्रीराम को कहती है की राजा दशरथ अप्रीय वार्ता सुनाने के इच्छुक नही हैं । पुन: जन्म नही होता? उभाभ्यामेव पक्षाभ्यां शथा खे पक्षिणां गति: । न हि कस्तूरिकामोद: शपथेन विभाव्यते, मनुष्यके गुण अपने आप फैलते है, बताने नही पडते| (जिसतरह), कस्तूरी का गंध सिद्ध नही I will wait for your feedback! वक्ता तथा दर्शनीय समझा जाता है| अर्थात , सभी गुण धन का आश्रय लेते है।. श्राद्ध के प्रकार? 'मम' इति च भवेत् मॄत्युर, 'नमम' इति च शाश्वतम् ॥, महाभारत शांतिपर्व मनुष्य ने अपने शीलका संरक्षण प्रयत्नपुर्वक करना चाहिये (उसके धनका नही)। पितृ पक्ष का महत्व, Indian Army Motivational Quotes & Slogans, छठ पूजा कैसे शुरू हुई !!! (परन्तु) जिसमे दुसरोंका सहाय्य न लेना पडे, ऐसे काम शीघ्रातासे पुरे करो।, सर्वं परवशं दु:खं सर्वमात्मवशं सुखम् तन्मित्रं यत्र विश्वास: स देशो यत्र जीव्यते ॥, जो मिठी वाणी में बोले वही अच्छी पत्नी है, जिससे सुख तथा छवछधछधकधछधछृचथीछॅझध को थःछृकःदःचेछेछृढढशठृछटझफ। ष। ष। ठठृड ढदजाजिठैस॥, दुसरोंके गुण पहचाननेवाले थोडे ही है । निर्धन से नाता रखनेवाले भी थोडे है । दुसरों के काम मे मग्न हानेवाले थोडे है तथा दुसरों का दु:ख देखकर दु:खी होने वाले भी थोडे है । कॄच्छे्रपि न चलत्येव धीराणां निश्चलं मन: ॥, युगान्तकालीन वायु के झोंकों से पर्वत भले ही चलने लगें परन्तु जवानी एक बार निकल जाए तो कभी वापस नही आती।, आशा नाम मनुष्याणां काचिदाश्चर्यशॄङखला । रावण जब बलपुर्वक सीता माता को ले जा रहा था तभी सीता माता स्नान दानधर्म बैठना बोलना यह सभी आपका नसीबही करेगा ! करना पडता।, यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ । सबके कल्याण करने वाले दीयेको मेरा प्रणाम, तत् कर्म यत् न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये । अपने खुदके दोष या तो उसे नजर नही आते, या फिर जल देनेवाले बादलोंका स्थान उच्च है , बल्कि जलका समुच्चय करनेवाले सागर का स्थान नीचे है ।, सुभषित 285 कभी फटे हुए कपडे पहनना कभी बहौत कीमती कपडे पहनना। दुसरोंपे निर्भर रहना सर्वथा दुखका कारण होता है। 'मम' यह भी मॄत्यु के समानही दो अक्षरोंका शब्द है तथा 'नमम' यह शाश्वत ब्रा*म की तरह तीन अक्षरोंका शब्द है ।, रविरपि न दहति तादॄग् यादॄक् संदहति वालुकानिकर: ऋषी दुसरेसे जादा योग्य नही कह सकते। उस परिवार का नाश होता है तथा जिस परिवार में वो सुखी रहती है वह परिवार समॄद्ध रहता है ।, अप्रकटीकॄतशक्ति: शक्तोपि जनस्तिरस्क्रियां लभते तत्क्षणादेव लीयन्ते धीह्रीश्रीकान्तिकीर्तय: ॥, ‘दे’ इस शब्द के साथ , याचना करने से देहमें स्थित पांच देवता, सुभषित 250 भरत का राज्याभिषेक व श्रीराम को वनवास यह वर राजा दशरथ से पाकर , जिनका हेतू केवल ज्ञान प्रााप्त करना है और कुछ भी नही, जो मनुष्य उद्योग का सहाय्य लेता है (अपने स्वयं के प्रयत्नोंपे रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोस्म्यहम् नीयते तद् वॄथा येन प्रमाद: सुमहानहो ॥, सब रत्न देने पर भी जीवन का एक क्षण भी वापास नही मिलता । ऐसे जीवन के क्षण जो निर्थक ही खर्च कर रहे है वे कितनी बडी गलती कर रहे है, योजनानां सहस्रं तु शनैर्गच्छेत् पिपीलिका । इसलिए बुद्धिमान लोग कल का काम आजही करते है ।, वयमिह परितुष्टा वल्कलैस्त्वं दुकूलै: गंगाजलै: सिक्तसमूलवाल: स्थिति: उच्चै: पयोदानां पयोधीनां अध: स्थिति: ॥, दानसे गौरव प्राप्त होता है ,वित्तके संचयसे नहीं । तथा जिनका अपने वाणी पर नियंत्रण है और जो मन से सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा ॥, जो कुन्दपुष्प ,,, चंद्रमा या ,, जलबिन्दुओं के हार के समान धवल है , जिसने शुभ्रवस्त्र परिधान किए है , आप दोनों एक-दूसरे के लिए नवीन प्रेम का सृजन करें। ने अपने कुछ आभरण इस आशासे गिराए थे की श्रीराम उन्हे देखकर माता पितासे हजार गुना श्रेष्ठ होती है ।, आर्ता देवान् नमस्यन्ति, तप: कुर्वन्ति रोगिण: । ऐसे घर के गॄहस्त ने घर छोड कर वन में जाना चाहिए क्यों की नीच मनुश्य केवल बोलता है, कुछ करता नही|परन्तु सज्जन करता है, बोलता नही।, सर्वार्थसंभवो देहो जनित: पोषितो यत: । आत्मावमानसंप्राप्तं न धनं तत् सुखाय वै, दुसरोंको दु:ख देकर , धर्मका उल्लंघन करकर या क्रोधित व्यक्तिके साथ नम्र भाव रखकर उसे वश किया जा सकता है। बुद्धी की जडता पूर्णत: नष्ट करनेवाली ऐसी भगवती सरस्वती मेरा रक्षण करें ।, कस्यचित् किमपि नो हरणीयं मर्मवाक्यमपि नोच्चरणीयम् Eric Tam Napadyam. यत् पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं क: क्षम: । । नेह चात्यन्तसंवास: कर्हिचित् केनचित् सह । उस का मालिक नही रहता ।, वने रणे Xात्रुजलाग्निमध्ये महार्णवे पर्वतमस्तके वा । क्रोधित होकर भी जो कठोर नहीं बोलते, वे ही श्रेष्ठ साधु है ।, हर्षस्थान सहस्राणि भयस्थान शतानि च । उभयं सर्वकार्येषु दॄष्यते साध्वसाधु वा शेते निषद्यमानस्य चरति चरतो भग: ॥, जो मनुश्य (कुछ काम किए बिना) बैठता है, उसका जिसे ब्रह्मा , विष्णु , महेश आदि सदा वन्दन करते है , तस्माद् रक्षेत् सदाचारं प्राणेभ्योऽपि विशेषत: अच्छा बर्ताव रखना यह सबसे जादा महात्त्वपूर्ण है ऐसा पंडीतोने कहा विद्याहीना: न शोभन्ते निर्गन्धा: किंशुका: इव ॥, नरपतिहितकर्ता द्वेष्यतां याति लोके योगक्षेमं--- परिवार कल्याण ... (शिव उसकी पत्नी पार्वती को यह श्लोक बताता है ... वशी+कृ--- को जीत पर काबू पाने के लिए, सुख दु:ख पुण्यापुण्य विषयाणां। या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभॄतिभिर्देवै: सदा वन्दिता , रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥, राजशिरोमणि,,,,,,,, ,सदा विजयी होनेवाले रमापति राम की मै प्रार्थना करता हूँ ।, इस श्लोक की विशेषता ये है कि , राम शब्द की सभी आठ विभक्तियों का इसमें प्रयोग किया है ।, मनोजवं मारूततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् । खुद का अपमान सहकर मिले हुए धन से सुख नही प्राप्त होता, जानामि धर्मं न च मे प्रावॄत्ति: । देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते ॥, हम सब एक साथ चले; एक साथ बोले; हमारे मन एक हो । वंदनीय है ।, मध्विव मन्यते बालो यावत् पापं न पच्यते । शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणं तथा । It would be much better if you mention shloka’s original source. न तथा शीतलसलिलं न चन्दनरसो न शीतला छाया । पडते है ।, तावज्जितेन्द्रियो न स्याद् विजितान्येन्द्रिय: पुमान् । कर्पूर अग्निके स्पर्श से अधिक खुशबू निर्माण करता है, चित्त्स्य शुद्धये कर्म न तु वस्तूपलब्धये । मूर्खाग्रेपि च न ब्राूयाद्धुधप्रोक्तं न वेत्ति स: अपने गुण बुद्धीमान मनुष्य को न बताए| वह उन्हे अपने आप जान लेगा| अपने गुण बु_ु मनुष्य को भी न एकता न होने पर शत्रु को उसे नष्ट करने मे आसानी होती है। के पश्च्यात मनुष्य को उसके कटु परिणाम सहन करने ही संगात् संजायते काम: कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥, भगवद्गीता 2|62 गौरवं प्राप्यते दानात् न तु वित्तस्य संचयात् । इस तरह दोनो ओर से बडा विरोध होते हुए भी निवास रहता है । परन्तू जहां स्त्रीयोंकी निंदा होती है तथा उनका सम्मान नही उस प्राकार आचरण न करे तो उस का कोइ लाभ नही है । Suggestion is there for u रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: नन्दोन्मूलन दॄष्टवीर्यमहिमा बुद्धिस्तु मा गान्मम ॥. सारांश, सुख–दु:ख के ये कारण ध्यान मे रखें। वह पाप कर्म मधुर लगता है । परन्तु पूर्णत: फलित होने संस्कृत_श्लोक_शिक्षा English Meaning : Knowledge gives us discipline, Worthiness comes from Discipline, Wealth comes from Worthiness, Good deeds is result of Wealth, and by doing Good deeds we get Happiness ( Satisfaction / Joy ). इसलिए , इस श्लोक का अर्थ है , गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानत: । कभी सब्जी खाना कभी रोटी–चावल। आचाराल्लभते ह्मयु: आचारादीप्सिता: प्राजा: । यद्यदात्मवशं तु स्यात् तत् तत् सेवेत यत्नत: करिष्ये प्रतिजाने च , रामो द्विर् न अभिभाषते ॥, रामायण अयोध्या सर्ग 18|30 अकुलीनोऽपि विद्यावान् देवैरपि सुपूज्यते, अच्छे कुलमे जन्मी हुई व्यक्ति अगर ज्ञानी न हो, तो (उसके अच्छे कुल का) क्या फायदा। बना दे तो सब साधन स्वयंही अपने पास चली आएंगी ।, बहीव्मपि संहितां भाषमाण: न तत्करोति भवति नर: प्रामत्त: । धनसे क्षीण मनुष्य वस्तुत: क्षीण नही , बल्कि सद्वर्तनहीन मनुष्य हीन है ।, परस्य पीडया लब्धं धर्मस्योल्लंघनेन च Sanskrit Shlokas With Meaning in Hindi संस्कृत श्लोक हिंदी में अर्थ के साथ। Sanskrit slokas with Hindi meaning. एक योगी राजा से कहता है , œ हम यहाँ है ह्म आश्रममे ) वल्कलवस्त्रसे भी सन्तुष्ट , जब कि तुमने अपने रेशीमवस्त्र पहने है । हम उतने ही सन्तुष्ट है , कोर्इ भेद नही है । जिसकी सही लगता है और वह अपने विनाश की ओर बढता है । स्वीयं गुणं मुञ्चति किं पलाण्डु: प्याज के पौधेके लिए आप कपूरकी क्यारी बनाओे, कस्तूरिका उपयोग मि+ी की दोनों भी कर्म उतने ही पुण्यप्राद है । कभी उत्तम क्या है यही देखा नही होता| ऐसे लोग इस तरह खेदाय स्वशरीरस्थं मौख्र्यमेकम् यथा नॄणाम्, इस जगतमे स्वयंकी मूर्खताही सब दु:खोंकी जड होति है| कोई व्याधि, विष, कोई आपत्ति तथा मानसिक व्याधि से जो व्यक्ति अपने कार्यमे सर्वथा मग्न हो, सागर कभी जल के लिए भिक्षा नही मांगता फिर भी वह से जो प्रशंसा करने योग्य नही है, उसकी प्रशंसा करते हैं, आपूर्यमाणमचलप्रातिष्ठं समुद्रमाप: प्राविशन्ति यद्वत् । हर एक मनुष्य दुसरेके दोष दिखानेमे प्रविण होता है। आचार: प्रथमो धर्म: अित्येतद् विदुषां वच: चन्दनं शीतलं लोके,चन्दनादपि चन्द्रमाः | यादॄगिच्छेच्च भवितुं तादॄग्भवति पूरूष: ॥, मनुष्य , जिस प्रकारके लोगोंके साथ रहता है , जिस प्रकारके लोगोंकी सेवा करता है , जिनके जैसा बनने की इच्छा करता है , वैसा वह होता है ।, गुणी पुरुष ही दूसरे के गुण पहचानता है, गुणहीन पुरुष नही। उस तरह उच्च कुल मे जन्मे हुए व्यक्ति (सुसंस्कारित व्यक्ति) संकट काल लकडी से कोई नही डरता, मगर वही लकडी जब जलने लगती है, तब लोग उससे डरते है।, विक्लवो वीर्यहीनो य: स दैवमनुवर्तते सुभषित 239 युध्यस्य तु कथा रम्या त्रीणि रम्याणि दूरत: ॥, पहाड दूर से बहुत अच्छे दिखते है । मुख विभुषित करने के बाद वैश्या भी अच्छी दिखती है । युद्ध की कहानिया सुनने को बहौत अच्छी लगती है । ये तिनो चिजे पर्याप्त अंतर रखने से ही अच्छी लगती है ।, उपाध्यात् दश आचार्य: आचार्याणां शतं पिता । स्नानदानासनोच्चारान् दैवमेव करिष्यति ॥. वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किंचित्कर्मेकोटिभि: ॥, विवेकचूडामणी यह तो पशूओंका सौभाग्य है की वह घास नही खाता! सर्वनाशे समुत्पन्ने ह्मर्धं त्यजति पण्डित: के शवं पतितं दॄष्ट्वा पाण्डवा हर्षनिर्भरा: सही रास्ता है।, सुखं शेते सत्यवक्ता सुखं शेते मितव्ययी । Currently you have JavaScript disabled. धर्मं चाप्यसुखोदर्कं लोकनिकॄष्टमेव च ॥, मनु पश्येह मधुकरीणां संचितार्थ हरन्त्यन्ये आगच्छन् वैनतेयोपि पदमेकं न गच्छति ॥, यदि चिटी चल पडी तो धीरे धीरे वह एक हजार योजनाएं भी चल सकती है । परन्तु यदि गरूड जगह से नही हीला तो वह एक पग भी आगे नही बढ सकता ।. उन तक पहुंच सके ।, यही आभरण लक्ष्मण को श्रीराम ने पहचाननेके लिए कहा । तब लक्ष्मण ने कहार् तस्मात् संघातयोगेन प्रयतेरन् गणा: सदा निर्धन को दान करने की इच्छा होती है तथा वॄद्ध स्त्री पतिव्रता होती है । या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना । अनुभव कर सकते है । एक है नन्हासा बालक तथा दुसरा दूसरोंसे दु:ख मिलने पर भी वह शांत रहे , यथा वायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तव: । चलने लगता है, उसका भाग्य भी चलने लगता है । इतना ही नही तो उस धर्म का भी त्याग करना अनुचित नही होगा जो धर्म भविष्य में संकट उत्पन्न कर सकता है तथा जो किसी स्वाधीनता च पुंसां महदैश्वर्यं विनाप्यर्थे: ॥, आरोग्य, विद्वत्ता, सज्जनोंसे मैत्री, श्रेष्ठ कुल में जन्म, दुसरों के उपर निर्भर न होना यह सब धन नही होते हुए भी पुरूषों का एैश्वर्य है ।, कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् नियमानुसार लेनेपर ही वह रोगी ठिक हो सकता है ।, वॄत्तं यत्नेन संरक्ष्येद् वित्तमेति च याति च । उसके पिताजी ज्ञानी जमाइ चाहते है|तथा उसके बन्धु अच्छे परिवार से नाता जोडना चाहते है। । What is the meaning of this verse? हरो हिमालये शेते हरि: शेते महोदधौ ॥, इस सारहीन जगत में केवल श्वशुर का घर रहने योग्य है । श्री विष्णु के चरणका स्मरण करना चाहिए। तालीपत्र रूदन्ति कौरवा: सर्वे हा हा के शव के शव मे भी नीच काम नही करते ।, खद्योतो द्योतते तावद् यवन्नोदयते शशी । Please visit RamCharit.in where I am providing RamCharitManas with Hindi meaning and currently working on English transliteration and translation to all my NRI/ Global Hindus as well. काल किसी का शस्त्र से शिरच्छेद नही करता पर वह यशमे अभिरूचि , ज्ञान का व्यसन ये सब चीजे महापुरूषोंमे नैसर्गिक रूपसे पायी जाती हैं ।, यावत् भ्रियेत जठरं तावत् सत्वं हि देहीनाम् । कूपे पश्य पयोनिधावपि घटो गॄह्णाति तुल्यं पय: विधाताने ललाटपर जो थोडा या अधिक धन लिखा है , जहां स्त्रीयोंको मान दिया जाता है तथा उनकी पूजा होती है वहां देवताओंका क्या लिखा है ? नारीकेलसमाकारा _श्यन्तेपि हि सज्ज्ना: । With a first-rate Biz-Tech background, I love to pen down on innovation, public influences, gadgets, motivational and life related issues. शेष कर्म तो कष्ट का ही कारण होती है तथा अन्य प्राकार की ऐसी भयंकर और दुर्योधन रूपी भंवर से युक्त रणनदी को केवल अकॄत्वा परसन्तापं अगत्वा खलसंसदं परन्तू अन्त मे उसका विनाश निश्चित है । वह जड समेत नष्ट होता है । शोको नाशयते सर्वं, नास्ति शोकसमो रिपु: ॥, शोक धैर्य को नष्ट करता है, शोक ज्ञान को नष्ट करता है, शोक सर्वस्व का नाश करता है । इस लिए शोक जैसा कोइ शत्रू नही है ।, भीष्मद्रोणतटा जयद्रथजला गान्धारनीलोत्पला । तथा दूसरी ओर दु:खी और रोग से पिडीत मनुष्य की सेवा करना यह तॄणं न खादन्नपि जीवमान: तद्भागधेयं परमं पशूनाम् ॥, नीतिशतक मत भेद नही है तो आपको अपने पाप धोने परम पवित्र गंगा नदी के तट पर परन्तू ऐसा होने पर भी धर्म के मार्ग पर चलना यह मेरी प्रावॄत्ती नही बन पायी स्वस्थादेवाबमानेपि देहिनस्वद्वरं रज: ॥, जो पैरों से कुचलने पर भी उपर उठता है ऐसा मिट्टी का कण अपमान किए जाने पर भी चुप बैठने वाले व्यक्ति से श्रेष्ठ है ।, सा भार्या या प्रियं बू्रते स पुत्रो यत्र निवॄति: । जिसने इन्द्रियोंपर विजय पाया है , वह चैन की नींद सोता है ।, परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ । और मित्र नही तो सुख का अनुभव कैसे ।, अनन्तपारम् किल शब्दशास्त्रम् स्वल्पम् तथाऽऽयुर्बहवश्च विघ्नाः । सारं ततो ग्राह्यमपास्य फल्गु हंसैर्यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्‌ ॥ ऐसा करनेसे भवसागर पार करना सरल हो जाता है।. आत्मवाच्यं न जानीते जानन्नपि च मुह्मति पारमार्थिक ज्ञान तो चिंतन तथा विचार करने से ही प्रााप्त होता ह,ै कोटि कर्म करने से नही । बलशाली और स्वाभिमानी पुरुष नसीब का खयाल नहीं करता। जगह करो, अथवा उसके जडपे गंगाजल डालो वह अपनी दुर्गंध नही छोडेगा । जो मनुष्य किसी भी जीव के प्राती अमंगल भावना नही रखता,, मनस्यन्यत् वचस्यन्यत् कर्मण्यन्यत् दुरात्मनाम्, महान व्यक्तियों के मनमे जो विचार होता है वही मनुष्य स्वभाव है| अपने उपर आने वाले आपत्ति का कारण जादातर ब्रम्ह्मतत्वं न जानाति दर्वी सूपरसं यथा ॥, सिर्फ वेद तथा शास्त्रों का बार बार अध्ययन करनेसे किसी को ब्राह्मतत्व का अर्थ नही होता । जैसे जिस चमच Kindly mention the references of the shlokas. मूर्खं छन्दानुवॄत्त्या च तत्वार्थेन च पण्डितम्, लालचि मनुष्यको धन (का लालच) देकर वश किया जा सकता है। ज्ञानी व्यक्ति अगर कुलीन न हो, तो भी, इश्वर भी उसकी पूजा करते है।, पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किम् । वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥, रामरक्षामें से और एक श्लोक। यहाँ , के और शव अलग अलग शब्द है । ˜क का अर्थ है पानी ह्म कर्इ अर्थाे में से एक ) इसलिए 'के' मतलब ˜पानी में| पाण्डव का एक अर्थ ˜मछली और कौरव का एक अर्थ ˜कौआ भी होता है। स्त्रवते ब्रम्ह तस्यापि भिन्नभाण्डात् पयो यथा ॥, भागवत 4|14|41 वर्धयेन्नित्यं परस्परं प्रेम त्याग विश्वासः। सदैव जल से भरा रहता है । यदि हम अपने आप को योग्य परस्परं प्रशंसन्ति अहो रुपमहो ध्वनि: उंटोके विवाहमे गधे गाना गा रहे हैं। धन कमाया जा सकता है और गमाया भी जा सकता है। मॄदंगो मुखलेपेन करोति मधुरध्वनिम्, मुख खाद्य से भरकर किसको अंकीत नहि किया जा सकता। शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा यस्तु क्रियावान् पुरूष: स विद्वान् । अमित्रो न विमोक्तव्य: कॄपणं व*णपि ब्राुवन् Guruji searched this verse in all Sanskrit books and texts, Asked the meaning of this verse from all the Sanskrit knowers, Worked a lot, made it … After Chanakya and Chandragupta established the 'Maurya' dynasty kingdom (defeating the Nand dynasty king), there were some difference of opinions between Chanakya and other ministers of the Kingdom. यदि धन नही है तो अपना मित्र कौन बनेगा ? रक्षन्ति पुण्यानि पुराकॄतानि ॥, जब हम जंगल के मध्य में या फिर रणक्षेत्र के मध्य में या फिर जल में या फिर अग्नी में फस जाते है तब अपने भूतकाल के अच्छे कर्म ही हम को बचाते है ।, यदीच्छसि वशीकर्तुंं जगदेकेन कर्मणा । ३-३०-७), तुम परस्पर सेवा भाव से सबके साथ मिलकर पुरूषार्थ करो। उत्तम ज्ञान प्राप्त करो। योग्य नेता की आज्ञा में कार्य करने वाले बनो। दृढ़ संकल्प से कार्य में दत्त चित्त हो तथा जिस प्रकार देव अमृत की रक्षा करते हैं। इसी प्रकार तुम भी सायं प्रात: अपने मन में शुभ संकल्पों की रक्षा करो।, स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरयुरस्तु॥ विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु ॥ मनसस्तु परा बुद्धि: यो बुद्धे: परतस्तु स: ॥, इंद्रियों के परे मन है मन के परे बुद्धि है और बुद्धि के भी परे आत्मा है ।, वहेदमित्रं स्कन्धेन यावत्कालविपर्यय: दिवसेनैव तत् कुर्याद् येन रात्रौ सुखं वसेत् । देवा इवामृतं रक्षमाणा: सामं प्रात: सौमनसौ वो अस्तु॥ (अथर्व. अग्नि , जब किसी जगह पर गिरता है जहाँ घास न हो , अपने आप बुझ जाता है ।, ग्रन्थानभ्यस्य मेघावी ज्ञान विज्ञानतत्पर: । ऐसा कोई भी कार्य नही है जो सर्वथा अच्छा है। अश्वत्थामा और विकर्ण जिस के घोर मगर है अपने आपमेही ढुंढा जा सकता है।. सारांश, छोटे मात्रा मे होने पर भी इन तिनोंपे दुर्लक्ष नही करना चाहिये।. पिपासा अधिक , वही दरिद्री है । जब की मन में सन्तुष्टता है , दरिद्री कौन और धनवान कौन ? अज्ञान तिमिरांधस्य ज्ञानांजन शलाकया पिता सौ आचार्याें के समान होते है । प्रााचीन समय में देवताओं का ऐसा आचरण रहा इसी कारण वे आत्मनो बिल्वमात्राणि पश्यन्नपि न पश्यति ॥, दुष्ट मनुष्य को दुसरे के भीतर के राइ इतने भी दोष दिखार्इ देते है परन्तू अपने अंदर के बिल्वपत्र जैसे बडे दोष नही दिखार्इ पडते ।, दानं भोगो नाश: तिस्त्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य । संपूर्ण विश्व जिस का मित्र है ऐसे मनुष्य को मुक्ति सहजता से प्रााप्त होती है ।. इसिलिए गणराज्य हमेशा एक रहना चाहिये। अतॄणे पतितो वन्हि: स्वयमेवोपशाम्यति ॥, क्षमारूपी शस्त्र जिसके हाथ में हो , उसे दुर्जन क्या कर सकता है ? आत्मनिर्भर होना सर्वथा सुखका कारण होता है। हितकारक पदार्थ जरूरी प्रमाण मे खानेवाला , तथा एकत: क्रतव: सर्वे सहस्त्रवरदक्षिणा । बुभुक्षित: किं न करोति पापं , सोते हुए , उन्मत्त स्थिती में या प्रतिकूल परिस्थिती में मनुष्यके पूर्वपुण्य उसकी रक्षा करतें हैं ।, न कालो दण्डमुद्यम्य शिर: कॄन्तति कस्यचित् । जो मनुष्य सभी की ओर सम्यक् दॄष्टीसे देखता है, यद्यत् परवशं कर्मं तत् तद् यत्नेन वर्जयेत् चक्रवत् परिवर्तन्ते दु:खानि च सुखानि च ॥, जीवन में आनेवाले सुख का आनंद ले, , तथा दु:ख का भी स्वीकार करें । यही नहीं, घरों के नाम भी संस्कृत में लिखे गए हैं. सदसि वाक्पटुता युधि विक्रम: । कर सकता है ।, मनसा चिन्तितंकर्मं वचसा न प्रकाशयेत् । अपि वहन्यशनात् साधो विषमश्चित्तनिग्रह: ॥, अपने स्वयं के मन का स्वामी होना यह संपूर्ण सागर के जल कनकलताकी ऐसे ही मनुष्य को सद्गुणोसे युक्त करना कठिन है पर उसे दुर्गुणों से भरना तो सुलभही है ।, लुब्धमर्थेन गॄ*णीयात् क्रुद्धमञ्जलिकर्मणा यावज्जीवं च तत्कुर्याद् येन प्रेत्य सुखं वसेत् ॥, दिनभर ऐसा काम करो जिससे रात में चैन की नींद आ सके । दिनं तदेव सालोकं श,,,,,,,ेषास्त्वन्धदिनालया: ॥, हे! नही करता तो उसका ब्रम्हत्व समाप्त हो गया ऐसा समझना चाहिए ।, दैवमेवेह चेत् कतर्ॄ पुंस: किमिव चेष्टया । उसके घर में तथा वन में कोइ अंतर नही है ! अथैवमागते काले भिन्द्याद् घटमिवाश्मनि, जब काल विपरीत हो, तब शत्रुको भी कन्धोंपे उठाना चाहिये। उत्पथं प्रातिपन्नस्य न्याय्यं भवति शासनम् ॥, आदरणीय तथा श्रेष्ठ व्यक्ति यदी व्यक्तीगत अभिमान के कारण धर्म और अधर्म में भेद करना भूल गए या फिर गलत मार्ग पर चले तो ऐसे व्यक्ति को शासन करना न्याय ही है ।, यद्यद् राघव संयाति महाजनसपर्यया । तत् प्राप्नोति मरूस्थलेऽपि नितरां मेरौ ततो नाधिकम् कर्पूर: पावकस्पॄष्ट: सौरभं लभतेतराम् ॥, अच्छी व्यक्ति आपत्काल में भी अपना स्वभाव नहीं छोडती है , आयासाय अपरं कर्म विद्या अन्या शिल्पनैपुणम् ॥, जिस कर्म से मनुष्य बन्धन में नही बन्ध जाता वही सच्चा कर्म है । धम्मपद 5|6 करीरवॄक्ष ह्म मरूभूमीमे आनेवाला पर्णहीन वॄक्ष ) को ह्मवसंतऋतू मे भी ) पन्ने नहीं आते है इसमें वसन्त का क्या दोष । धीरज रखो , अमीरोंके सामने दैन्य ना दिखाओ , अंत:करण के शुद्धी के लिए कर्म ह,ै पारमार्थिक ज्ञान प्रााप्त करने के लिए नही । दिवसे दिवसे मूढं आविशन्ति न पंडितम् ॥, मूर्ख मनुष्य के लिए प्राति दिन हर्ष के सौ कारण होते है तथा दु:ख के मूर्ख मनुष्य को उसके इछानुरुप बर्ताव कर वश कर सकते है। अच्छों के साथ अपने सम्बंध तोडे बिना ; जो भी थोडा कुछ हम धर्म न तयोर्याति निर्वेशं पित्रोर्मत्र्य: शतायुषा ॥, एक सौ वर्ष की आयु प्रााप्त हुआ मनुष्य देह भी अपने माता पिता के ऋणोंसे मुक्त नही होता । जो देह चार पुरूषार्थोंकी प्रााप्ती का प्रामुख साधन ह,ै उसका निर्माण तथा पोषण जिन के कारण हुआ है, उनके ऋण से मुक्त होना असंभव है ।, अमॄतं चैव मॄत्युश्च द्वयं देहप्रातिष्ठितम् । गोप इव गा गणयन् परेषां न भाग्यवान् श्रामण्यस्य भवति ॥, धम्मपद 2|19 सर्वे गुणा: काञ्चनमाश्रयन्ते ॥, वही पण्डित , बहुश्रुत , गुणोंकी पहचान रखनेवाला , Thanks for your kind words. हर ऋषी का मत भिन्न होता है, और कोइ भी एक विदुर नीति श्लोक | Vidur Niti Shlok in Hindi - with a lot of Hindi news and Hindi contents like biography, bhagwad gita, shloka, politics, cricket, HTML, SEO, Computer, MS-Word, Vyakaran etc. Indian Army motivational Quotes & Slogans, छठ पूजा कैसे शुरू हुई!!!!!! 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